श्रमणसंघ इतिहास

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कोई भी सघ समाज संगठित और सुव्यवस्थित हुए बिना चिरकाल तक जीवित नहीं रह सकता। बिखरा हुआ संघ या बिखरे हुए व्यक्ति कभी शक्तिशाली नहीं हो सकते। साध व समाज की स्थिति पर जनपको बड़ी चिंता थी। स्थानकवासी समाज अनेक उपसम्प्रदायों में बंटा हुआ था। एक दूसर द न-व्यवहार तो दूर रहा एक दूसरे को साधु साध्वी तक नहीं मानते थे। एक मकान में भा उचित नहीं समझते थे। एक समान वेष, एक सरीखी वेशभूषा, एक-सी क्रिया, विचार होने पर भी परस्पर एक दूसरे के साथ इतना मतभेद क्यो? एक साथ एकमंच पर व्याख्यानादि स्थान में निवास या सहभोज क्यो नहीं? इस विघटनकारी प्रवृति के कारण ही स्थानकवासी सम्पदाय पत, कार्यक्षमता एवं एकरुपता समाप्त हो रही थी इसके लिए प्रखर तत्ववेता, लेखक श्री वाडीलाल शाह आगे से विचार विमर्श किया।

जैन कॉन्फ्रेस की बैठकों मे इस पर विस्तार पर्वक चर्चा हुई। स्थानकवासी समाज के धर्मवारीदुर्लभजी भाई जौहरी की दृष्टी इस संप्रदाय में फैली हई फट. अनेकता, गिरावट, द्वेष-वृति की ओर गई। एकी करण एवं वृहद् साधु सम्मेलन के लिए जोरशोर से प्रयत्न शुरु किये। जैन कॉन्फ्रेंस का शिष्ट मण्डल अनेक साधु-साध्वीयों की सेवा में पहुँचा और एक साधु सम्मेलन अखिल भारतवर्षिय स्तर का अजमेर में बुलाना तय किया गया। संवत 1933 के अपूर्व अमृत क्षण का अवतरण चैत्र सुदी 10 को दिन में 2.30 बजे आकाश में चमकते प्रचंड सूर्य की तरह हुआ। मंगलवार के मंगलमय दिन से प्रारम्भ होकर यह सम्मेलन निरंतर 15 दिन तक चला। इस प्रथम साधु सम्मेलन में 238 मुनिराज एवं 80 साध्वीजी के साथ ही 76 अन्य मुनिराज प्रतिनिधी के रुप मे सादर सम्मिलित हुए। इनमें पूज्य श्री नानकराम जी.मा.सा., पूज्य श्री रघुनाथजी मा.सा.,पू. श्री जयमलजी मा. सा., पू.श्री चौथमलजी मा. सा. पू. श्री. धर्म सिंहजी मा. सा., पू.श्री. उतमचन्दजी मा.सा, श्री ज्ञानचन्द्रजी मा.सा., पू. श्री. एकलिंग दास जी मा.सा., पू.श्री. मोतीलालजी मा.सा., पू.श्री. अमरसिंहजी मा.सा. की सम्प्रदाय के साथ-साथ श्री खंभात, पू श्री. ऋषि, श्री कच्छ की मोटी, श्री लिंबड़ी की छोटी, बोटाद, कोटा एवं पंजाब सम्प्रदाय के संत-साध्वी उपस्थित थे। इसमें श्री वर्धमान संघ, संवत्सरी, दीक्षा आयुष्य, एक आचार्य, आदि अनेक गंभीर विषयों पर चर्चा व निर्णय किया। 18 अप्रैल 1933 को सम्मेलन का विसर्जन हुआ। इसके पश्चात अनेक प्रांतिय स्तर पर साधु सम्मेलन होते रहे। इन्ही प्रयासों को आगे बढाते हुए सन 1952 में सादड़ी में वृहद् साधु सम्मेलन बुलाया गया। जहाँ 32 में से 22 सम्प्रदाय एक साथ आए। श्रद्धालुओं की संख्या लगभग 70-80 हजार पार कर गई। सर्वत्र प्रेम का आनन्दमय वातावरण फैल गया था।

संवत 2001 वैसाख शुक्ल तृतीया अर्थात अक्षय तृतीया के पावन दिन उपस्थित सभी मुनिराजो ने श्रमण संघ के प्रथमाचार्य परम पूज्य श्री आत्मारामजी मा.सा. को मनोनीत किया। प्रधानमंत्री श्री आनंद ऋषि जी मा.सा. को मनोनीत कीया। इस सम्मेलन में गुरुदेव श्री अंबालालजी मा.सा.भी. उपस्थित थे. करीब 13 प्रस्तावों पर निर्णय किया गया। इसके पश्चात पदाधिकारी संतो का सोजत भीनासर में सम्मेलन हुए। संवत् 2016 में आचार्य श्री आत्मारामजी मा.सा. देवलोक हो गए। जैन कॉन्फ्रेंस के सभी पदाधिकारी संतो से विचार विमर्श किया और संतो ने द्वितीय पाट पर श्री आनंद ऋषि जी मा.सा. को आचार्य घोषित किया। उसके पश्चात 2 मई 1987 को पूना में वृहद साधु सम्मेलन सम्पन्न हआ। जिसमें उपाचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी मा.सा. महामंत्री श्री सौभाग्य मुनिजी मा.सा. एवं युवाचार्य श्री शिवमुनिजी मा.सा.को मनोनित किया। आचार्य सम्राट श्री आनंद ऋषि जी मा.सा. के देवलोक होने पर आचार्य श्री देवेन्द्र मुनिजी मा.सा. को एवं ततपश्चात श्री शिवमुनि मा.सा. को आचार्य बनाया गया जो वर्तमान मे आचार्य है। (जैन कॉन्फ्रेंस शताब्दी ग्रंथ से)