मेवाड सम्प्रदाय के ज्योतिर्मय नक्षत्र

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भामाशाह की वीर भूमि मेवाड़ में जैन संतो की एक महान परम्परा लगभग 400 वर्षों से चली आ रही है । इस संत परम्परा ने न केवल मेवाड़ की धार्मिकता को उजागर किया है किन्तु वहां के लोक जीवन को भी सेवा, समर्पण, त्याग और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में सदा प्रेरित किया है । मेवाड़ मे स्थानकवासी श्रमणों की इस गरिमामयी परम्परा में अनेक दीप्तीमान नक्षत्र संतो का कुछ परिचय यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

पट्ट परम्परा : पूज्य श्री धर्मदास जी महाराज के भारत विश्रुत 99 शिष्यों मे से पूज्य श्री छोटे पृथ्वीराज जी म.सा. पांचवे या छठे शिष्य थे । पूज्य श्री पृथ्वीराज जी म.सा. मेवाड़ की यशस्वी संत परम्परा के मूल संत गिने जाते है। मेवाड़ प्रदेश में जैन धर्म की मुकुलित कलि को विकसित करने का पूरा श्रेय पूज्य श्री पृथ्वीराज जी म.सा. को ही जाता है । ये मेवाड़ सम्प्रदाय के प्रथम आचार्य थे। पूज्य श्री पृथ्वीराज जी म.सा. के पश्चात पूज्य श्री दुर्गादास जी म., पूज्य श्री हरजी राज जी म., पूज्य श्री गंगोजी म., | पूज्य श्री रामचंद्रजी म., पूज्य श्री मनोजी म., पूज्य श्री नारायणदास जी म., पूज्य श्री पूरनमल जी म., क्रमश: मेवाड़ सम्प्रदाय के पट्टालंकृत हुऐ । ऐसे में छोटी और बड़ी दोनो पट्टानुक्रम से घोर तपस्वी पूज्य श्री रोड जी स्वामी का नाम आता है । श्री रोडजी स्वामी एवं उनके बाद का सन्तों का संक्षिप्त परिचय यहां प्रस्तुत किया जा रहा है ।

1. घोर तपस्वी श्री रोडजी स्वामी
मेवाड़ की पुण्य घरा पर त्याग, तप तथा संयम स्वरुप त्रिपथगामिनी गंगा को अवतारित और प्रवाहित करनेवाले घोर तपस्वी श्री रोडजी स्वामी का जन्म मावली, नाथद्वारा के मध्य स्थित “देपर" नामक ग्राम से हुआ । लोढ़ा गौत्रीय श्री डूंगरजी पिता एवं श्रीमती राजीबाई इनके माता थे । जन्म समय वि.स. 1804 था । वि.सं. 1824 में श्री. रोडजी ने श्री हरि मुनिजी के पास संयम ग्रहण किया । स्वामीजी साध्वीचार की साधना के प्रखर थे । श्री रोडजी स्वामी तपस्वी ही नही निकट अभिग्रहों के भी बड़े प्रेमी थे । अभिग्रह सरल भी होते है और कठिन भी । उनके एक एक अभिग्रह ऐसा असंभव अभिग्रह था जो पूर्ण भी हुआ और इतिहास में अमर भी हो गया एवं स्वामी श्री रोडनी को भी अमर कर गया । उसमें एक अभिग्रह हाथी का था । उन्होंने निर्णय किया कि हाथी अगर आहार वहराये तो ही G आहार ग्रहण करुंगा वरना जीवन भर आहार लेने का त्याग । यह एक बहुत बड़ी विचित्र प्रतीज्ञा थी और वह भी एकदम गुप्त । आखिर एक दिन हाथी ने अपनी सूंड से हलवाई की दुकान से लडू का थाल उठाकर मुनि श्री की ओर कर दिया। हलवाई की अनुमति मिलते ही मुनि श्री ने हाथी के द्वारा वहराया गया आहार ग्रहण कर लिया, इसी तरह का एक अभिग्रह बैल द्वारा गुड़ वहराने का है जो पूर्ण हुआ इस तरह के अनेक दृष्टांत सुनायी देते है।

2. आचार्य श्री नृसिंह दास जी म.सा.
घोर तपस्वी श्री रोडजी स्वामी का उदयपुर में स्वर्गवास G हुआ। तदन्तर मेवाड़ सम्प्रदाय में यशस्वी आचार्य पट्टपर नृसिंह दास जी म. को सत्तारुढ किया गया । श्री नृसिंह दास जी म. का जन्म स्थान रायपुर (मेवाड़) है । आपके पिता श्री गुलाबचंद खत्री एवं माता श्रीमती गुलाबबाई थे । आपका जन्म वि.सं. | 1827-1831 के बीच किसी वर्ष का होना चाहिए। आप की | दीक्षा मार्गशीर्ष कृष्ण 9 वि.सं. 1852 में हुई एवं स्वर्गवास फाल्गुन शुक्ल 8 वि.सं. 1889 को हुआ। आचार्य श्री नृसिंह दास जी म. अच्छे ज्ञानी, ध्यानी, तपस्वी वक्ता, कवि और ओजस्वी आचार्य रत्न थे । आपने मेवाड़ सम्प्रदाय का एक तरह से नवीनीकरण भी किया था ।

3. आचार्य श्री मानजी स्वामी
मेवाड़ के जैन जगत में सर्वाधिक यदि किसी जैन संत का ! नाम लिया जाता है तो वह है “पूज्य श्री मानजी स्वामी" । आप एक ऐसे चमत्कारित महापुरुषों में गिने जाते है कि जिनके नाम की यहां “आण" लगती है । सभी आपके नाम की मालाऐ तक फैरते है गुणगान की स्तुतियां आदि गाते है। आपका जन्म स्थान देवगढ़ (मदारिया) है । श्रीमती छन्ना, देवी माता का नाम व श्री तिलोकचंद गांधी आपके पिताश्री थे। । जन्म तिथी कार्तिक शुक्ल 4 वि.सं. 1863 है । आपकी दीक्षा कार्तिक शुक्ला 5 वि.सं. 1872 को हुई । पूज्य श्री मानजी स्वामी एक विद्वान गुरु के तेजस्वी शिष्य थे। नृसिंहाचार्य से आपने अच्छा ज्ञान ग्रहण किया । आचार्य श्री नृसिंहदास जी म. के स्वर्गवास के पश्चात आपको संघ का आचार्य पद प्रदान किया। जिस तरह नाथ सम्प्रदाय में गोरखनाथ जी का जीवन चमत्कार का पर्याय बना है । उसी तरह पूज्य मानजी स्वामी भी जैन सम्प्रदाय में चमत्कार के एक पर्याय है। श्री मानजी स्वामी की सेवा में एक देवी और दो भैरव उपस्थित रहते थे ऐसी बहुत पहले से ही चली आ रही धारणा है ।

4. तपस्वी राज श्री सूरजमलजी महाराज
तपस्वीराज श्री सूरजमल जी महाराज का जन्म स्थान कालेरिया (देवगढ़) था । लोढ़ा गौत्रीय श्री थानजी पिता एवं श्रीमती चन्दबाई माता के यहां वि.सं. 1852 में आपका जन्म हुआ। 20 वर्ष की वय में आचार्य श्री नृसिंहदासजी म. के पास चैत्र कृष्णा 13 वि.स. 1872 को आपने दीक्षा ग्रहण की । 36 वर्ष निर्मल संयम पालन कर वि.स. 1908 जेष्ठ कृष्णा 8 को आपका स्वर्गवास हुआ । मुनिश्री कवि व अच्छे वक्ता भी थे।

5. कविराज श्री रिखबदास जी महाराज
आचार्य श्री नृसिंहदास जी. म के जितने शिष्य थे उनमें पूज्य श्री मानचन्द्रजी स्वामी तो थे ही, तपस्वी श्री सूरजमल - , जी महाराज भी पूज्य श्री नृसिंहाचार्य के शिष्य हो सकते है। । श्री रिखबदासजी म.श्री सूरजमल जी म.के शिष्य थे। श्री रिखबदासजी म. राजस्थानी भाषा के अच्छे माने हुऐ कवि थे। कविराज का जीवन सुन्दर, सक्रिय तथा सार पूर्ण रहा । पूज्य श्री मानजी स्वामी के स्वर्गवास के पश्चात् मेवाड़ संघ का नेतृत्व कविराज श्री रिखबदास जी म. के पास रहा । : कवि राज के प्रधान शिष्यों में श्री बालकृष्ण जी म.श्री वेणीचंदजी म. एवं श्री मालचंदजी म. मुख्य रहे है।

6. श्री बालकृष्णजी महाराज
पूज्य श्री रिखबदास जी म. के प्रधान शिष्यों में श्री बालकृष्ण जी म. मुख्य है । आपका विचरण काठियावाड़ गुजरात क्षेत्रो में अधिक रहा । आप के प्रवचनों का चतुर्दिका बड़ा प्रभाव था । उपदेशों में राजमहलों से झोपड़ों तक के लगभग सभी वर्गों के व्यक्ति भाग लिया करते थे । आपने मोरवी के राजदरबार में भी कई प्रभावशाली प्रवचन फरमाये। आप बड़े चमत्कारिक संत रत्न थे । मोरवी में आपके प्रवचनों की धूम मच गई थी । जैन धर्म का प्रभाव चारों और फैल चुका था । श्री बालकृष्ण जी महाराज ने जैन धर्म की विजय पताका फहराई। श्री बालकृष्ण जी म. का जीवन एक स्फुरित जीवन था । वैभव के विराट दलदल से आलिप्त मोरवी दरबार को उद्बोधित करना और ज्ञान के गुलाब से आलिप्त कर देना अपने आप में कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं थी ऐसी गुण स्वामीजी मे विद्यमान थे ।

7. श्री गुलाबचन्द जी महाराज
श्री गुलाबचंदजी महाराज श्री बालकृष्ण जी म. के शिष्य रत्न थे । इनका जन्म स्थान मोरवी (काठियावाड) था आप मोरवी दरबार के पुत्र थे । मोरवी राज दरबार में प्रभावशाली तात्विक उपदेशों एवं सूबेदार जैसे चमत्कारों से प्रभावित होकर मोरवी दरबार ने श्री गुलाबसिंहजी को दीक्षा की अनुमति दी । आपकी दीक्षा मोरवी में हुई उस समय एक लाख रुपया। खर्च कर मोरवी दरबार ने दीक्षा महोत्सव मनाया । श्री। गुलाबचंदजी म. अपने गुरु श्री बालचंद्रजी म. के साथ कई वर्षो तक गुजरात काठियावाड मे विचरे फिर मेवाड़ राजस्थान में विचरण करने चले गये।

8. आत्मार्थी श्री वेणीचन्दजी महाराज
आत्मार्थी श्री वेणीचन्दजी म. का जन्म स्थन चाकूडा । (उदयपुर) है आप ओसवंशीय मादरेचा कुलोत्पन्न है । आपने कविराज श्री रिखबदास जी म. के पास संयम ग्रहण किया । श्री वेणीचन्द जी म. की संयम रूची बडी प्रखर थी, आप बहुत ही उत्कृष्ट क्रिया पात्र एवं त्याग तप मे रमण करने वाले उच्च कोटी के संत रत्न थे । आप के समय मेवाड़ सम्प्रदाय मे संतो की काफी कमी हो गयी थी । आप काफी चमत्कारिक संत रत्न थे । आपकी संयम साधना में अपूर्व तेज विधमान था । देव भी दर्शनों को आया करते थे ऐसी - धारणा है । कई बार आपके ऊपर केशर की बरसात भी हुई थी । श्री वेणीचन्दजी म. को श्री एकलिंगदासजी म. एवं श्री शिवलालजी म.सा जैसे सुयोग्य सुशिष्यों की उपलब्धि भी हुई । श्री वेणीचन्दजी म.सा का स्वर्गवास फाल्गुन कृष्णा 8 वि.स. 1961 को चेनपुरा में हुआ ।

9. आचार्य श्री एकलिंगदास जी महाराज
मेवाड़ में जिन शासन को समलंकृत करनेवाले संत रत्नो की ज्योतिर्मयी परम्परा में पूज्य आचार्य श्री एकलिंगदास जी म. का समुज्जवल व्यक्तित्व अपनी विमल सुयश क्रान्ति से । सर्वदा चमकता रहेगा । मेवाड़ के संघ को सुव्यवस्थित नवीनता से सुसज्जित करने का श्रेय पूज्य श्री एकलिंगदास जी म. को जाता है । संगेसरा (चित्तौडगढ़) में पिता श्री शिवलाल जी सहलोत एवं माता श्रीमती सूरताबाई के यहा ज्येष्ठ कृष्णा अमावस वि.सं. 1917 को आपका जन्म हुआ । मेवाड़ राज्य एकलिंगजी (महाराणा के इस्ट देवता) का ही माना जाता है। श्रीवेणी चन्दजी म. के सदुपदेशो से प्रभावित होकर उन्ही के चरणों में फाल्गुन शुक्ल । वि.सं 1948 को आकोला में आपने दीक्षा अंगीकार की । आपके आचार्य पद ग्रहण करने के पश्चात संघ में संत सतियों की संख्या में भी वृद्धि हुई । 16 मनिराजों एवं 52 सतियाँजी कुल 68 ठाणा आपके नेश्राय मे थे । आपके शासन काल में संघ में चतुर्मुखी विकाश हुआ । आपकी सद्प्रेरणा से वि.सं. 1974 में राजकरेड़ा मे कालाजी के स्थानपर होनेवाली बलि हिंसा हमेशा के लिए बंद हो गयी । आचार्य श्री की सद्प्रेरणा से वि. सं. 1977 में नाथद्वारा में लगभग २ हजार बकरों को आजीवन अभयदान भी दिलाया । आप तप में भी बहुत आगे थे । श्रावण कृष्णा 2 वि.सं. 1987 को वल्लभनगर में आपका स्वर्गवास हुआ । पूज्य श्री ने मेवाड़ को नया वातावरण, व्यवस्था व प्रेरणा भी दी । आपके सानिध्य मे मेवाड़ का चतुर्मुखी विकास हुआ।

10. मेवाड़ भूषण श्री मोतीलाल जी म.सा.
मेवाड़ के जैन समाज को दिशा निर्देशन करने में जिन सत्पुरुषों का योग है, उनमें मेवाड़ भूषण श्री मोतीलालजी म. का एक महत्त्वपूर्ण योगदान है । पूज्य श्री का जन्म स्थान वल्लभनगर है । आपके पिताजी का नाम श्री धूलचन्दजी सामर एवं माताजी का नाम श्रीमती जड़ाव देवी था। आपने मार्गशीर्ष शुक्ला 7 वि.सं. 1960 को पूज्य गुरुदेव श्री एकलिंग दास जी म.सा. के चरणों में सनवाड़ में दीक्षा ग्रहण की। आपका प्रवचन काफी चमत्कारिक एवं प्रभावशाली होता था। जेष्ठ शुक्ला 2 वि.सा. 1963 को लावा सरदारगढ़ में आपको मेवाड़ संघ का आचार्य पद प्रदान किया गया । आपका व्यक्तित्व अपने आप में सुदृढ आकर्षक एवं जादू और विलक्षण का औज था । आचार्य श्री का युग साम्प्रदायिक संघर्षों का यग था। आपके समक्ष किसी का साहस नहीं हो पाता था कि वह आकर कोई विवाद करें । आप काफी चमत्कारिक एवं ओजस्वी वक्ता भी थे । आपके आचार्य काल में मेवाड़ संघ का चतुर्मुखी विकास भी हुआ। पूज्य श्री की जन्म भूमि, दीक्षा भूमि और निर्वाण भूमि यद्यपि मेवाड़ रही किन्तु कार्य क्षेत्र, विचरण क्षेत्र केवल मेवाड़ तक सिमित नही था। पंजाब, रावलपिण्डी (वर्तमान पाकिस्तान) महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, गुजरात आदि क्षेत्रों में विचरण भी किया । जीवन के आखिरी 22 वर्षों तक मेवाड़ सम्प्रदाय के शासन का बड़े सुन्दर ढंग से संचालन किया । इस बीच कई दीक्षाऐ भी सम्पन्न हुई। धर्म संघ पूज्य श्री के नेतृत्व में फला है फूला। श्रमण संघ बनने पर मंत्री पद के दायित्व का निर्वाह निर्भिकता से किया । पूज्यश्री का पूरा जीवन उच्च रहा। वर्षों तक एक समय भोजन किया करते थे । श्रावण (द्वितीय) शुक्ला 14 वि.सं. 2015 को देलवाड़ा में आपका स्वर्गवास हुआ।

11. श्रृध्देय श्री जोधराजजी महाराज
पूज्य आचार्य श्री एकलिंगदास जी म.सा. के योग्यतम शिष्य प्रशिष्यों में एक नाम श्री जोधराजजी म.सा. का भी आता है। श्री जोधराजजी म. का जन्म देवगढ़ निकट तगड़िया ग्राम में वि.सं. 1940 के आसपास हआ था । उनकी माता का नाम श्रीमती चम्पाबाई व पिता का नाम श्री मोतीसिंह जी था । ये क्षत्रिय वंशीय थे। आप प्रारंभ में रामस्नेही संतो के सानिध्य में रहे । जब जैन मुनिचर्या का ज्ञान हो गया तो मार्गशीर्ष शुक्ला 8 वि.सं. | 1965 को आपने आत्मकल्याण स्वरुप जैनेन्द्रिय दीक्षा ग्रहण की । आपने श्री एकलिंग दास जी के सुशिष्य श्री कस्तुरचंदजी म. का शिष्यत्व ग्रहण किया । आप अच्छे वक्ता व गुरु सेवा निष्ठ थे । स्व. श्री कन्हैयालालजी म. आपके ही सुशिष्य थे । आश्विन शुक्ला 5 वि. सं. 1998 में कुँवारियाँ में आपका स्वर्गवास हुआ।

12. सरल स्वभावी श्री भारचन्दजी म. सा.
सरल स्वभावी श्री भारचंदजी म.सा. का जन्म मावली जक्शन के समीप सिन्दु नामक कस्बे में वि.सं. 1950 में पिता श्री भेरुलालजी वडाला एवं माता श्रीमती हीराबाई के यहां हुआ । आपने वि. सं. 1970 में थामला कस्बे में पूज्य श्री मोतीलालजी म.सा. के सानिध्य में दीक्षा ग्रहण की। ज्ञानाभ्यास की ऐसी रट लगायी कि अल्प समय में ही आप पाट पर बैठकर व्याख्यान भी देने लगे । आपका व्याख्यान काफी सरल एवं प्रभावशाली होता था । किसान, हरिजन, जैन, जेनेतर सभी आपके प्रवचनो के लिए दौड़ जाते थे । आपने भारत के अधिकांश क्षेत्रों में विचरण भी किया। श्री भारमलजी म. बडे लोकप्रिय संत थे उनके प्रशंसको की संख्या भी बहुत थी। अधिकतर बच्चे, बुढ़े, जवान उन्हे 'भारु बा' के नाम से पुकारते थे। श्री भारचंदजी म. सा सचमुच में जनता के संत थे। श्रावण अमावस्या वि.सं. 2018 में राजकरेड़ा में आपका स्वर्गवास हुआ ।

13. श्रृध्देय श्री मांगीलालजी म. सा.
पूज्य श्री एकलिंगदासजी म. के शिष्य परिवार में श्रृध्देय श्री मांगीलालजी म. सा. का नाम कई गौरवपूर्ण सच घटनाओं के साथ जुडा हुआ है । इसका जन्म राजकरेडा में पिता श्री गंभीरमलजी संचेती एवं माता श्रीमती मगनबाई के यहाँ पौष कृष्ण अमावस्या वि. सं. 1967 को हुआ। वैशाख शुक्ला 3 वि.सं. 1978 को रायपुर में माता और पुत्र की भागवती दीक्षा सम्पन्न हुई । वि. सं. 1989 में हुए अजमेर वृहद् साधु सम्मेलन में भी आप पधारे थे । मेवाड़ सम्प्रदाय के रिक्त आचार्य पद की पूर्ति करने के लिए मेवाड़ के चतुर्विध संघ ने पूज्य श्री मोतीलालजी . म. को आचार्य पद एवं आपको युवाचार्य का पद सरदारगढ़ में प्रदान किया गया । कई जगह देवी देवताओं के यहा होनेवाले बलिदानो को भी आपने प्रेरणा देकर बन्द करवाया । आपने कुछ वर्षों के पश्चात श्रमण संघ से त्यागपत्र भी दे दिया । मेवाड़, मध्य भारत, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, मुंबई, महाराष्ट्र आदि कई प्रदेशो में आपने विचरण किया। आप स्वभाव से भद्र और मिलनसार थे । समाज में रचनात्मक कार्यों के प्रति आपका बडा आग्रह रहा करता था । जेष्ठ शुक्ल वि. सं. 2020 में सहाड़ा में आपका स्वर्गवास हुआ। स्व.प.रत्न हस्तीमलजी महाराज, स्वं. पं. रत्न श्री कन्हैयालालजी म. सा., 'मेवाडी', एवं श्री पुष्करमुनिजी म. सा., 'ललित' आपके सुशिष्य थे ।

14. श्रृध्देय प्रवर्तक श्री अम्बालालजी म. सा.
पूज्य प्रवर्तक श्री अम्बालालजी म. सा. का जन्म ज्येष्ठ शुक्ला 3 वि. सं. 1962 को थामला में पिता श्री किशोरीलालजी सोनी (ओसवाल जैन) एवं माता श्रीमती प्यारबाई के यहाँ हुआ । बचपन का नाम श्री हमीरमलजी रखा गया। उसके पश्चात हमीरमलजी से श्री अम्बालालजी रखा गया । अभ्यास करने के पश्चात आपको सरकारी नोकरी प्राप्त हो गयी उसके पश्चात माता-पिता के स्वर्गवास के कारण सरकारी नोकरी छोड़नी पडी और स्वयं का व्यवसाय करना पडा अपने छोटे भाई को सार संभाल भी आपके कंधो पर आ पडी थी । फिर भी आपका मन धर्म ध्यान की ओर अधिक रहा । आप एक बार हथियाना शादी में पधारे तो वहाँ श्री मोतीलालजी मसाज अपने शिष्य श्री भारमलजी म. सा के साथ वहाँ पधारे AN भारमलजी म., श्री अम्बालालजी के ममेरे भाई होते थे। तभी श्री अम्बालालजी से श्री मोतीलालजी म. ने कहा मो क्या, सच्चे भाई बन जाओ । इस एक वाक्य ने दीक्षा की ओर आकर्षित किया । परिवार वाले दीक्षा नहीं दिलाना चाहते एवं श्री अम्बालालजी लेना चाहते थे । उन्हें महाराणा के चंगुल मे फंसाया गया । महाराणा के आलावा भी अनेक मुसीबतें दीक्षा लेने में आयी । आखिर मार्गशीर्ष शक्ला वि.सं. 1982 को मंगलवाड में दीक्षा का कार्यक्रम सम्पत्र हाव एवं बडी दीक्षा भादसोडा मे हुई। सादड़ी सम्मेलन में मेवाड़ सम्प्रदाय के साधु साध्वीयों। का प्रतिनिधित्व भी आपने ही किया था । इसके अलावा आप। मंत्रीपद पर रहते हुए अजमेर सम्मेलन में भी पधारे । अजमेर सम्मेलन को सफल बनाने में आपका काफी योगदान रहा । यही से आप प्रवर्तक भी कहलाने लगे । आप हिन्दी, गुजराती. प्राकृत, संस्कृत, अंग्रेजी आदि भाषाओं के प्रकाण्ड विद्वान थे। आपका विहार क्षेत्र राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, मुंबई, दिल्ली, हरियाणा, उत्तरप्रदेश आदि प्रमुख रहा। मेवाड़ मंत्री, मेवाड़ संघ शिरोमणी, मेवाड़ मुकुट, मेवाड़ के मूर्धन्य । संत, मेवाड़ रत्न, जन-जन के श्रद्धा केन्द्र आदि पदवियाँ आपको प्रदान की गयी। आप श्रमण संघ के प्रवर्तक भी थे । आपने प्रथम चातुर्मास वि सं. 1983 में जयपुर में एवं अन्तिम चातुर्मास वि सं. 2050 का मावली जंक्शन मे किया। आपका दि. 15-1-1993 को फतेहनगर (मेवाड़) में स्वर्गवास हुआ। जहां पर आपकी याद मे पावन धाम बना हुआ है। जो लाखोलाख भक्तों का श्रद्धा केन्द्र है। श्रमण संघीय महामंत्री श्री सौभाग्य मुनिजी म. सा. 'कुमुद' आपके सुशिष्य है । मेवाड़ प्रान्त में आपका काफी प्रभाव था । आप श्रमण संघ के काफी मूर्धन्य वयोवृद्ध संत रत्न थे ।

15) पूज्य प्रर्वतक श्री मगन मुनिजी मा. का.
आपका जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ । प्रारम्भ से ही आपको जैन धर्म में आस्था रही। उसी का प्रतिफल था कि आपने जैनधर्म अंगिकार किया तथा वि.स. 1996 आषाढ कृष्णा त्रयोदशी गुरुवार को जैन साधु के रुप में अवतरित हुए । स्व. पूज्य गुरुदेव श्री अम्बालालजी म.सा. आप के गुरु थे। सादगी, निर्मलता, स्पष्टवादिता, कवि-प्रवचन भूषण आपके अलंकार थे। हजारों मील पैदल यात्रा कर के आपने जैन धर्म का प्रचार प्रस्तर किया था। आप हमेशा मेवाड़ी भाषा में प्रवचन करते थे। जिससे आपके प्रवचनों में जैनोत्तरों की संख्या भी काफी रहती थी। आपकी भाषा इतनी सरल थी कि प्रत्येक व्यक्ति आप की बात को समझ सकता था। मवाड़ी भाषा में जब आप लोगों को कविता-पान कराते थे, तो उपस्थित जनमानस आत्मविभोर हो जाता था । जहाँ भी आप जाते थे, सभी धर्मों के लोग आपके प्रवचन सुनने को लालायित रहते थे। पूज्य प्रवर्तक गुरुदेव श्री अम्बालालजी म. सा. के स्र्वगवास के पश्चात आपको ही वि.स. 2056 चैत्र शुक्ला पंचमी को उदयपुर मे मेवाड़ पूज्य प्रर्वतक का भार सौंपा गया । उसके पश्चात आपने पुरे मेवाड़ का भ्रमण किया । आपका स्वास्थ्य उस समय अनुकूल न होते हुए भी आप ने निरंतर विहार करके लोगों तक जिन शासन का संदेश पहुँचाया था। गुरुदेव के स्वर्गवास के पश्चात आई रिक्तता को आपने भरा । आप लाखों लोगों की आस्थाओं के केन्द्र थे। वि.स. 2056 चैत्र शुक्ला पंचमी को उदयपुर में समाधीपूर्वक काल धर्म को प्राप्त हुए।

16) तपोनिधि प्रवर्तक इन्द्रमलजी म.सा. "मेवाड़ी"
स्थानक वासी जैन संप्रदाय जातीवात के विषय में अन्य संप्रदायो की अपेक्षा ज्यादा खुला है और विशाल हृदय है। तपोनिधी इन्द्र मुनीजी म.सा.ऐसे संतरत्न थे जो सुधार जाति से होने पर भी बचपन मे संयम धारण कर श्री चतरिंग जी सुधार व माता कंकुबाई सुधार के पुत्र थे। आपने आषाढ कृष्णा त्रयोदशी वि.स. 1996 को वल्लभनगर मे मेवाड भषण पूज्य | मोतीलालजी म.सा.के सानिध्य मे मगन मुनीजी व आपकी दीक्षा साथ मे हुई। दीक्षीत होन के बाद इन्द्रमुनीजी महाराज अध्ययन करने में जुट गये। व तपश्चर्या के क्षेत्र मे निरन्तर विकास करते रहे। उपवास बेला से लेकर अडतीस तक के तप अनेक बार कीये। सात बार मास खमण तप कीये। श्रमण संघ व आचार्य श्री ने आपको तपोनिधीजी की पदवी प्रदान की। आप पुज्य भारमलजी म.सा. के शिष्य थे किन्तु शिक्षा दीक्षा पुज्य मोतीलालजी म.सा. के नेतृत्व मे ही सम्पन हुई। वि.स. 2056 मे आपको प्रवर्तक पद से नवाजा गया। सुदीर्घ संयम की साधना करके आपने अपना जीवन सफल बनाया। वि.स.2061 मगसर शुक्ला एकादशी को फतहनगर पावनधाम में आपने समाधि मरण प्राप्त किया।

17) श्रमण संघीय महामंत्री श्री सौभाग्य मुनिजी मा. सा. "कुमुद"
आपका जन्म दि. 10-12-1937 (वि. सं. 20 मार्गशिर्ष शुक्ला सप्तमी) को आकोलाग्राम जिला चितौड़ (राज.) में गाँधी परिवार में हुआ । आपके पिता का नाम नाथूलालजी व माता का नाम नाथबाई था । होनहार विरवान के होत चिकने पात आप के बाल्याकाल सेही आप को आत्मा का आभास होने लग गया था । आप प्रारम्भ से ही एक र्धम प्रेमी, देशभक्त धुन के पक्के तथा क्रांतिकारी विचारों के थे । उस समय देश स्वाधिनता संग्राम के दौर में था । आपने उसमें भी अपना रचनात्मक सहयोग दिया । पितृत्व सुख से किशोर अवस्था में ही वंचित हो जाने पर आप की धर्म के प्रति निष्ठा ओर बढ गई। आपके धार्मिक विचारों को आपकी माता एवम् बहिन श्री उगमकुंवरजी म.सा. का संबल प्राप्त था । आपने स्व. पुज्यप्रवर्तक श्री अम्बालालजी म. सा. के दर्शन किए तो आपके मन में भी वैराग्य की भावना जागृत हुई । इस भावना को गुरुदेव ने भी महसूस किया । आपके मन में जो वैराग की भावनाओं का तूफान उठा उसी का परिणाम था कि अंतत: परिवार एवम् समाज के घोर विरोध के बावजूद आपने दि. 2 फरवरी 1950 (वि. सं. 2006 माघ शुक्ला पूर्णिमा) को कड़ियाँ ग्राम में दीक्षा ग्रहण कर “सुजानमल" से श्री सौभाग्यमुनि के रुप में अवतरित हुऐ ।

गुरुदेव के साथ हजारो मील की पदयात्रा कर जैनधर्म का संदेश घर-घर पहुँचाया । देखते ही देखते आप न सिर्फ मेवाड़ स्थानकवासी समाज में छा गये अपितु पूरे भारतवर्ष के स्थानकवासी समाज के उच्च संतो में आप की गणना होने लगी। जैन समाज को आपने एक नई दिशा तथा चिंतन दिया। इसी का परिणाम था कि द्वितिय पट्टघर आचार्य सम्राट श्री आनंदऋषीजी मा. सा. ने आपको श्रमण संघ का महामंत्री नियुक्त किया । आपकी जिम्मेदारी ओर बढ़ गई । आपने पूरे स्थानकवासी समाज को श्रमणसंघ के तहत लाने का बिड़ा उठाया और काफी सफलता भी मिली। सन 1983 में आपका मुम्बई मे पधारना हुआ । आपने यहां मेवाड़ से आकर बसे सभी स्थानकवासियों को इकट्ठा किया तथा उन्हे श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ मेवाड़ मुम्बई नामक संस्था के तहत गठीत किया । आपकी प्रेरणा से इस संस्था ने अपने कार्य के बल पर कुछ ही समय में अनेक साधना सदनों का निर्माण किया । अनेक संत व सतियों के चातुर्मास करवाकर धर्म आराधना की। अनेक रचनात्मक कार्य आपकी प्रेरणा से होने लगे । पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के पश्चात आप ही मेवाड़ स्थानकवासी समाज के एक मात्र चमकते सूर्य है । आप एक अच्छे वक्ता, लेखक तथा कवि के रुप में जाने जाते है । आपके प्रवचनों में हमेशा अच्छी संख्या रहती है । आपका हमेशा प्रयास रहता है कि मेवाड़ स्थानकवासी समाज के साथ सम्पूर्ण स्थानकवासी समाज संगठित हो एक हो तथा अखिल भारतीय श्रमण संघ के नेतृत्व में आये । आपका जीवन मंगलमय हो तथा आप दिर्घायु हों । और जिनशासन पथ के उच्चतम शिखर तक पहुंचे एसी मंगल कामना।

18. "मेवाड़ प्रर्वतक श्री मदन मुनी जी म.सा. पथिक"
मेवाड़ प्रर्वतक मदन मुनीजी म.सा.का जन्म वि.सं 1988 को राजसमंद जिले के लावा सरदारगढ गांव मे पिताश्री गमेरमलजी हींगड़ व माता सुंदरबाई के यहां पर हुआ। आप जन्म से ही होनहार व कार्यकुशल थे आपने 22 वर्ष की उम्र मे 31 अक्टुबर 1953 को मोलेला ग्राम मे मेवाड़ संघ शिरोमणी पूज्य प्रर्वतक गुरुदेव, श्री अंबालालजी म.सा. से दीक्षा ग्रहण की और आप अध्ययन करने में जुट गये। आपने हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत, राजस्थानी भाषा मे अध्ययन किया और कई साहित्यो की रचना की जैसे कथा कुसुम भाग 3, निर्धूम ज्योति, अपनी बात, चिंतन के चरण, आत्मा के संग जिवन के रंग, उदबोधन, चिंतन के चरण, उदबोधक, प्रकाश की पगडण्डी, बागो वासना के मुत, जीवन कण, पदौ उठ गया, हेमप्रभा, पुज्य माठ गुरु स्मृति ग्रंथ, एवम् रसिक स्मृति ग्रंथ का सफल संम्पादन किया। आपने राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, मेवाड़ मे विहार कर जैन धर्म का प्रचार प्रसार किया आपकी ही सदप्रेरणा से श्रीमान गुरु स्मृति संस्थान नाथद्वारा का निर्माण हो पाया आपने अपना पुरा जीवन साधु संतो व गरुदेव की सेवा मे ही बिताया आप परम् सेवाभावी संत है आप मे और भी कई विशेषताए है आप विराट करूणाशील, क्रियाशील स्वाध्यायी, ओजस्वी प्रवचनकार सह्रदय स्नेहिल मानस, आगम ज्ञाता, अहर्निश सेवा-साधना मे रत संत रत्न है। आप मेवाड़ की जनता के दिलो मे राज करते है आपको सन 2005 मे नाथद्वारा मे प्रर्वतक पद से नवाजा गया है। आप सरल स्वभावी सेवाभावी संतरत्न है आपका जीवन मंगलमय हो तथा दीर्घायु हो और जिनशासन पथ के उच्चतम शीखर तक पहुचे एसी मंगल कामना करते है।

19. मुनिश्री जयवर्धनजी "पियुष" :
आपका जन्म भीलवाड़ा जिले में रायपुर ग्राम में दि. 1-7-1960 को रखा। आपकी माताजी का नाम पानकुंवरजी एवं पिताजी का नाम कालूलालजी चोरड़िया है । बचपन से ही आपमें धार्मिक एवं आध्यात्मिक विचार कूट-कूट कर भरे हैं । साधु-संतों एवं चारित्र आत्माओं के सानिध्य में रहकर निरंतर ज्ञानार्जन करना आपकी । आदत में शुमार है। इसी के बूते आगे चलकर आपने पू. गुरुदेव श्री सौभाग्य मुनिजी म.सा के सानिध्य में मुंबई के गिरगाँव चौपाटी पर दि. 02-02-1988 को दीक्षा ग्रहण की। आप अत्यन्त सेवाभावी एवं मधुर गायक है। प्रार्थना गाने के एक अलग ही अन्दाज एँव सुमधुर राग के कारण ही आपको “प्रार्थना पट्ट' के विशेष अलंकार से अलंकृत किया गया ।

20. युवा मनिषी कोमल मुनीजी म.सा.
युवा मनिषी कोमल मुनिजी का जन्म राजसंमद जिले के भादला (लावासरदारगढ के पास) गांव मे पिता शंकरलालजी व माता मनोहरदेवी पोखरना ओशवाल वंश मे हुआ। आपका जन्म से नाम उत्तम चंद था। लावा सरदारगढ में साधु संतो जैन मुनीयो का आवागमन होता रहता है जिससे उनके संपर्क मे आने से वैराग्य भावना पैदा हो गई और अन्तत: सब छोडकर 22 अप्रेल गुरुवार सन् 1999 को चन्देसरा ग्राम मे मेवाड़ गौरव श्रमण संघीय महामंत्री गुरुदेव सौभाग्यमुनीजी म.सा. से दीक्षा ग्रहण कर कोमल मुनीजि म.सा. के रुप मे अवतरित हुए। धीरे धीरे अध्ययन करते रहे। आपका युवा जगत को धर्म से जोड़ने मे बड़ा हाथ है। मेवाड के यवको मे आपका गहरा प्रभाव है। युवा संगठन को मजबूत करने मे प्रयत्न शील रहते है। इसलिये आपको युवा मनिषी, करुणाकर आदि शब्द आपके नाम के आगे जुड़ने लगा है। आपने गुरु अम्बेश, सौभाग्य नवयुवक मण्डल को बड़ी मजबुती दी है। आप सरल स्वभावी संत रत्न है। आपका जीवन मंगलमय हो व दीर्घायु हो मेवाड़ संप्रदाय को आपसे बड़ी आशाए है।

 

जीवन चन्द भौतिक सुविधाएं पाकर ही अपनी सफलताओं को नहीं छू लेता। जीवन को सफलता तक पहुँचाने के लिए उसे ऐशो आराम यह भौतिक शान शौकत का प्रश्न है, यदि ये सीमातीत हो जाती है तो जीवन को उपद्रव ग्रस्त ही बना देती है । धर्म का अभिष्ट दरिद्रता नहीं है। किन्तु इतना अवश्य है कि भौतिकता भी एक सीमा तक ही होनी चाहिये ।
- सौभाग्य मुनि "कुमुद"